“बज़्म-ए-अदब” द्वारा आयोजित हुई नातिया नशिस्त*******
बहराइच : (NNI 24) अदबी तंज़ीम “बज़्म-ए-अदब” बहराइच के द्वारा मुहम्मद नगर कॉलोनी में दूसरी मासिक नातिया नशिस्त जमालअज़हरसिददीकी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई।नशिस्त में शहर के मुमताज़ अदीब,शायर, सहाफ़ियों और उर्दू से वाबस्ता अहल-ए-इल्म ने शिरकत की।
नशिस्त के सदर मुहम्मद जमाल अज़हर सिद्दीक़ी ने इज़हार-ए-ख़याल करते हुए कहा कि आज यह देखकर बड़ी ख़ुशी महसूस हो रही है कि “बज़्म-ए-अदब” के ज़ेर-ए-एहतिमाम आयोजित इस नातिया नशिस्त में तीन नस्लें मौजूद हैं, जो इस बात की तरफ़ इशारा है कि उर्दू ज़बान कभी नहीं मिट सकती। ज़ाहिर है कि आज यहाँ जितने लोग भी आए हैं, वे सब उर्दू ज़बान से मुहब्बत और तअल्लुक़ की बिना पर तशरीफ़ लाए हैं।
डॉक्टर सुफ़ियान अहमद अंसारी ने नातिया नशिस्त को ख़िताब करते हुए कहा कि नात का पढ़ना, लिखना, सुनना और सुनाना सवाब है, बशर्ते शरई हुदूद में रहकर नात कही जाए। नात-गोई मुश्किलतरीन फ़न है।
जुनैद अहमद नूर ने सीरत-निगारी के हवाले से बहराइच की कारकर्दगी का संक्षिप्त जायज़ा पेश किया।
शहर की मुमताज़ दर्सगाह आज़ाद इंटर कॉलेज के साबिक़ उस्ताद मास्टर ख़ालिद नईम, वसीउल्लाह क़ासमी, शादाब हुसैन (सहाफ़ी) और शफ़ीक़ अहमद बाग़बान ने भी नातिया नशिस्त के हवाले से गुफ़्तगू की।
नशिस्त का शुभारंभ बुजुर्ग शायर शादाँ रहमानी की नात से हुआ। डॉक्टर सुफ़ियान अहमद अंसारी की निजामत में आयोजित नातिया नशिस्त में शो‘रा ने अपनी ख़ूबसूरत नातें पेश कीं। जिन के मुन्तख़ब अशआर दर्ज-ए-ज़ैल हैं:
वहदानियत का सिक्का रवाँ हर तरफ़ हुआ ।
हर एक क़दम पे कुफ़्र को यूँ मात हो गई ॥
शादाँ रहमानी
फ़ौलाद मिस्ल-ए-मोम उधर, पत्थर पे निशाँ क़दमों के इधर ।
दाऊदؑ के हाथों में जो सिफ़त, वह शाह-ए-अरब के पाँव में ॥
मज़हर सईद
ख़ैरख़्वाहों, जाँ-निसारों को सलाम ।
मुस्तफ़ा के चार यारों को सलाम ॥
जमाल अज़हर सिद्दीक़ी
नबी के चाहने वाले यहाँ भी रहते हैं ।
इसी सबब से तो हिंदुस्तान रोशन है ॥
राशिद राही
जी में आता है दिन-रात रोता रहूँ ।
इश्क़-ए-अहमद में दामन भिगोता रहूँ ॥
मंज़ूर बहराइची
आमद से पहले आप की वीरान थी दुनिया ।
आकर के आप ने इसे आबाद कर दिया ॥
शादाब ज़फ़र
सानी-ए-मुस्तफ़ा कहाँ से मिले ।
जब कोई सानी-ए-बिलाल नहीं ॥
शफ़क़ अंसारी
आक़ा ने है रोका दर पर, मेरे मत आना ।
पैदल ही मदीने चल, क्यों देर लगाई है ॥
वसीम जौहर
नबी के इश्क़ से रोशन नहीं गर आपका सीना ।
नमाज़ें आप पढ़ने के लिए बेकार आए हैं ॥
तारिक़ हाशिम
बचा लीजिए रब के महबूब मुझको ।
मेरी दुनिया ज़ेर-ओ-ज़बर हो रही है ॥
नवाज़ बहराइची
सदर-ए-नशिस्त जमाल अज़हर सिद्दीक़ी की मेज़बानी और इज़हार-ए-तशक्कुर पर यह पुरनूर नातिया नशिस्त इख़्तिताम-पज़ीर हुई।

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