अवध वाटिका साहित्य संस्थान द्वारा आयोजित द्वारा आयोजित की गई नियमित पाक्षिक कवि गोष्ठी…….
अब्दुल अज़ीज़
बहराइच : (NNI 24) अवध वाटिका साहित्य संस्थान बहराइच के तत्वावधान में आयोजित नियमित पाक्षिक कवि गोष्ठी का आयोजन सेनानी भवन सभागार बहराइच में किया गया जिसकी अध्यक्षता संस्थान के अध्यक्ष पी0के0प्रचण्डजी जी ने की संचालन तिलक राम अजनबी ने किया तथा स्वयं के द्वारा माँ वीणा पाणि की वंदना से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इस कार्यक्रम में अवध वाटिका साहित्य संस्थान बहराइच के संरक्षक आदरणीय राम सागर राव जी(पूर्व विधायक) की उपस्थिति में नवोदित रचनाकार शिवा जी बाजपेयी ने श्रृंगार की भावपूर्ण कविता से सबका मन मोह लिया फिर कवि व शिक्षक सुनील कुमार ने पढ़ा —
आया सावन झूम के, गीत खुशी के गाने दो।
रोको न आज मुझे,
पिया के संग जाने दो।
कवि व शिक्षक संदीप मेहरोत्रा ने पढ़ा –
बच्चे बूढ़े युवा रंगे हैं तीन रंग के काया में।
इंक़िलाब हर बच्चा बोले, भारत माँ की छाया में।
कवयित्री मधुलिका स्वरूप ने पढ़ा –
नजारों का मंजर नहीं चाहिए। प्यास है पर समंदर नहीं
चाहिए। कहते हैं इश्क़ में हार भी जीत है, मुझे हारा सिकंदर नहीं चाहिए।
रईस सिद्दीकी ने पढ़ा
-जिनको पहचान गुंचा ओ गुल की नहीं
उनके हाथों में है इक्तिदार ए चमन।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे तिलक राम अजनबी ने पढ़ा
-बिन मांगे उपहार बने क्यूँ बैठे हो ।
अपनों पर प्रहार बने क्यूँ बैठे हो।
उठो अजनबी कुछ तो कर लो दुनिया में,,
तुम धरती के भार बने क्यूँ बैठे हो ।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कल्याण परिषद के संगठन मंत्री रमेश चन्द्र मिश्र ने स्वतंत्रता सेनानियों को समर्पित करते हुए अपनी रचना पढ़ी –
गुलामी के अवसान की जब बात उठी थी भारत में।
अंग्रेजों भारत छोड़ो मुहिम चली थी भारत में।
इस अवसर पर उपस्थित कवि सुभाषित श्रीवास्तव अकिंचन व शहनवाज खान ने भी अपनी अपनी रचना प्रस्तुत की फिर अवध वाटिका साहित्य संस्थान के संरक्षक आदरणीय राम सागर राव जी के द्वारा साहित्य के क्षेत्र में किये जा रहे सतत प्रयास के लिए कवि गोष्ठी में आने वाले सभी कवि एवं साहित्यकार बंधुओं की सराहना की और अपना आशीर्वचन प्रदान किया तथा अंत में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे संस्था के अध्यक्ष पी0के0प्रचण्डजी ने अध्यक्षीय काव्य पाठ करते हुए पढ़ा -सावन के मस्त फुहारों में हे नाथ कहाँ तुम भूले हो। क्यूँ नहीं आलिंगन करते हो न लंगड़े हो न लूले हो। तुम मुझसे क्यूँ रुठे हो, हे नाथ जरा बतलाओ तो, हम हँस हँसकर बात करी तुम कुप्पा जैसेन फूले हो। अंत में उपस्थित सभी कवि एवं साहित्य प्रेमी बंधुओं की सराहना की तथा आभार प्रकट किया इस अवसर पर अन्य तमाम साहित्य प्रेमी बंधु उपस्थित रहे तथा कार्यक्रम का आनन्द प्राप्त किया।

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